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पैरावेट्स एवं प्रगतिशील पशुपालकों के लिए एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित

मुजफ्फरनगर। हिन्दुस्तान सिटी न्यूज

पशु पालन विभाग, उत्तर प्रदेश सरकार एवं श्री राम कॉलेज के कृषि विभाग के संयुक्त तत्वाधान में पैरावेट्स और प्रगतिशील पशुपालकों के लिए एक दिवसीय प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम प्रशिक्षण एवं विस्तार योजना (राज्य योजना) के अंतर्गत संपन्न हुआ।

कार्यक्रम का शुभारंभ मुख्य अतिथि डॉ. जीतेन्द्र गुप्ता (मुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी), डॉ. विपिन नैन (पशु चिकित्सा अधिकारी, मुज़फ्फरनगर), संस्थान की प्राचार्या डॉ. प्रेरणा मित्तल, निदेशक डॉ. अशोक कुमार तथा धर्मेन्द्र मलिक (भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक एवम् कृषि विभाग के विभागाध्यक्ष डॉ. मौ. नईम द्वारा दीप प्रज्वलन के साथ किया गया। तथा उस्न्होने यह भी बतया की भारत में देसी गाय( साहिवाल-उच्च दुग्ध उत्पादन (10–15 लीटर/दिन),गर्मी सहनशील, रोग प्रतिरोधक क्षमता अधिक) गिर-मूल स्थान: गुजरात,रंग: सफेद-लाल धब्बेदार, विशेषता- 8–12 लीटर दूध,लंबे कान और उभरा हुआ माथा, थारपारकरका जन्म स्थान: राजस्थान (थार मरुस्थल) इसका रंग सफेद/हल्का ग्रे, इसकी विशेषता-8–10 लीटर दूध देना, सूखा सहनशील विदेशी नस्ल सुधार में उपयोगी है और भैंस मुर्रा,जाफराबादी, मेहसाना,सुरती की कई महत्वपूर्ण नस्लें पाई जाती हैं, जो दूध उत्पादन, सहनशीलता और स्थानीय जलवायु के अनुसार प्रसिद्ध हैं।


डॉ सुमित कौशिक (उपमुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी),इन्होने बतया की थनैला रोग गाय-भैंस के थनों का संक्रमण है, जिससे दूध खराब हो जाता है और उत्पादन कम हो जाता है। उपचार-दवा द्वारा उपचार- एंटीबायोटिक (पशु चिकित्सक की सलाह से), थन में डालने वाली दवा,दर्द व सूजन कम करने की दवा, सामान्यतः उपयोग-पेनिसिलिन / स्ट्रेप्टोमाइसिन, सेफ्ट्रिएक्सोन,घरेलू उपचार-हल्के गुनगुने पानी लाल दवा (KNO4) से थन की सिकाई करें, दिन में 3–4 बार पूरा दूध निकालें, सरसों के तेल + हल्दी से हल्की मालिश करना चाहिए, रेबीजके बारे में भी बताया एक वायरस जनित घातक रोग है, जो संक्रमित जानवर (जैसे कुत्ताबिल्ली,नेवला,आदि के काटने से गाय-भैंस और इंसानों में भी फैलता है।
इस अवसर पर मुख्य विशेषज्ञ के रूप में डॉ. राजीव त्यागी (उपमुख्य पशु चिकित्सा अधिकारी, मुज़फ्फरनगर) उपस्थित रहे। कार्यक्रम में लगभग 300 पैरावेट्स, प्रगतिशील पशुपालकों एवं कृषि से जुड़े विद्यार्थियों ने सक्रिय सहभागिता की। प्रशिक्षण कार्यक्रम के दौरान विशेषज्ञों द्वारा पशुपालन एवं पशु चिकित्सा से संबंधित विभिन्न महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत व्याख्यान प्रस्तुत किए गए।

साथ ही प्रतिभागियों की समस्याओं को ध्यानपूर्वक सुनकर उनके समाधान के व्यावहारिक सुझाव भी दिए गए। जो प्रतिभागी पशुपालन के क्षेत्र में नया व्यवसाय शुरू करना चाहते हैं, उन्हें विभिन्न सरकारी योजनाओं एवं उनकी प्रक्रिया के बारे में भी जानकारी प्रदान की गई।
मुख्य अतिथि डॉ. जीतेन्द्र गुप्ता ने अपने संबोधन में पशुपालन को किसानों की आय बढ़ाने का सशक्त माध्यम बताते हुए आधुनिक तकनीकों को अपनाने पर जोर दिया एवम पशुपालन में महिलाओं का भी बहुत योगदान है
एवम यह भी बताया की देसी गाय और भैंस में कई प्रकार के रोग (Diseases) पाए जाते हैं, जो उत्पादन (दूध), स्वास्थ्य और पशुपालन व्यवसाय को प्रभावित करते हैं। खुरपका-मुंहपका,लक्षण-मुंह और खुर में छाले, लंगड़ाना
दूध उत्पादन कम, बचाव- नियमित टीकाकरण (6 महीने में 1 बार), गलघोंटू, ब्लैक क्वार्टर, मास्टाइटिस, लक्षण-थन में सूजन,दूध में गांठ/खून,कारण- गंदगी, गलत दुग्ध निकालना, बचाव, साफ-सफाई, सही दुग्ध विधि, ब्रुसेलोसिस, लंपी स्किन डिजीज,रोकथाम-नियमित टीकाकरण कराएं,पशुशाला की सफाई रखें,साफ पानी और संतुलित आहार दें,बीमार पशु को अलग रखें,समय पर पशु चिकित्सक को दिखाएं समय पर टीकाकरण और साफ-सफाई से 70–80% रोगों से बचाव संभव है।
श्री धर्मेन्द्र मलिक (भारतीय किसान यूनियन अराजनैतिक) पशु बीमा किसानों और पशुपालकों के लिए बहुत महत्वपूर्ण है, जिससे गाय-भैंस की मृत्यु, दुर्घटना या बीमारी से होने वाले नुकसान की भरपाई की जा सकती है। उन्होंने विस्तार से बताया की बिमा एक ऐसी योजना है जिसमें पशु की कीमत के अनुसार प्रीमियम देकर उसका बीमा कराया जाता है, और नुकसान होने पर मुआवजा मिलता है। क्या-क्या कवर होता है- बीमारी से मृत्यु, दुर्घटना (एक्सीडेंट), प्राकृतिक आपदा (बाढ़, आग, बिजली), चोरी (कुछ योजनाओं में) बीमा कैसे होता है- पशु का मूल्यांकन पशु की नस्ल, उम्र और दूध उत्पादन के आधार पर कीमत तय होती है प्रीमियम -सामान्यतः: पशु की कीमत का 2%–4% प्रति वर्ष ,सरकारी योजना में सब्सिडी मिल सकती है
कार्यक्रम में आगामी वर्षों (2026–2030) को ध्यान में रखते ह,ए पशुपालन क्षेत्र में नवाचार एवं सतत विकास पर विशेष चर्चा की गई। विशेषज्ञों ने बताया कि आने वाले समय में डेयरी, बकरी पालन, मुर्गी पालन एवं मत्स्य पालन जैसे क्षेत्रों में तकनीकी हस्तक्षेप, डिजिटल मॉनिटरिंग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित पशु स्वास्थ्य प्रबंधन तथा ई-मार्केटिंग प्लेटफॉर्म की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होगी।
इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को ध्यान में रखते हुए पशुओं के लिए उन्नत नस्ल सुधार, पोषण प्रबंधन, रोग नियंत्रण एवं टीकाकरण कार्यक्रमों को सुदृढ़ बनाने पर बल दिया गया। सरकार द्वारा 2026–2030 के बीच पशुपालकों की आय दोगुनी करने, रोजगार सृजन बढ़ाने तथा ग्रामीण युवाओं को स्टार्टअप के लिए प्रोत्साहित करने हेतु विभिन्न योजनाओं के विस्तार की जानकारी भी दी गई।
विशेषज्ञों ने यह भी बताया कि पैरावेट्स की भूमिका भविष्य में और अधिक महत्वपूर्ण होगी, क्योंकि वे ग्रामीण स्तर पर पशु स्वास्थ्य सेवाओं को सशक्त बनाने में सेतु का कार्य करेंगे। इसके लिए उन्हें नियमित प्रशिक्षण, डिजिटल टूल्स एवं आधुनिक तकनीकों से जोड़ने की आवश्यकता है।
कृषि विभाग के छात्र-छात्राओं के लिए इस प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम भविष्य में अत्यंत लाभकारी सिद्ध होते हैं। सबसे पहले, ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से छात्रों को व्यावहारिक ज्ञान (Practical Knowledge) प्राप्त होता है, जिससे वे केवल पुस्तकीय ज्ञान तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वास्तविक परिस्थितियों में कार्य करना सीखते हैं।
दूसरे, पशुपालन, डेयरी, पोल्ट्री, बकरी पालन जैसे क्षेत्रों में रोजगार एवं स्वरोजगार के अवसर तेजी से बढ़ रहे हैं। इस प्रकार का प्रशिक्षण छात्रों को स्टार्टअप एवं उद्यमिता (Entrepreneurship) की दिशा में प्रेरित करता है, जिससे वे नौकरी खोजने के बजाय नौकरी देने वाले बन सकते हैं।
तीसरे, भविष्य के दृष्टिकोण से कृषि एवं पशुपालन में नई तकनीकों (AI, Digital Monitoring, Smart Farming) का उपयोग बढ़ेगा। ऐसे में प्रशिक्षित छात्र इन आधुनिक तकनीकों को अपनाकर अधिक उत्पादन एवं आय प्राप्त कर सकते हैं।
चौथे, इस तरह के कार्यक्रम छात्रों को सरकारी योजनाओं, सब्सिडी एवं लोन प्रक्रियाओं की जानकारी देते हैं, जिससे वे आसानी से अपना व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।
पांचवे, पैरावेट्स एवं विशेषज्ञों के साथ संपर्क से छात्रों का नेटवर्क मजबूत होता है, जो भविष्य में करियर के लिए बहुत उपयोगी होता है।
अंततः, ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम छात्रों में आत्मविश्वास, नेतृत्व क्षमता एवं समस्या समाधान कौशल का विकास करते हैं, जो उन्हें कृषि एवं पशुपालन क्षेत्र में सफल बनने में मदद करता है।
कृषि विभाग के छात्र-छात्राओं ने भी बढ़-चढ़कर भाग लिया और प्रशिक्षण सत्रों में सक्रिय रूप से सहभागिता करते हुए अपने ज्ञान एवं कौशल को विकसित किया।
कार्यक्रम के अंत में निदेशक डॉ. अशोक कुमार द्वारा सभी अतिथियों, विशेषज्ञों एवं प्रतिभागियों का धन्यवाद ज्ञापित किया गया। इस अवसर पर कृषि विभाग के समस्त अध्यापकगण डॉक्टर अंजली जाखड़(कृषि अर्थशास्त्र), डॉ प्रवीण मलिक(आनुवंशिकी और पादप प्रजनन), डॉ रिया जखवाल( उद्यान विज्ञानं), डॉ उमरा रहमानी (पादप- रोगविज्ञान), श्री सचिन कुमार साहू (कृषि प्रसार),डॉ अक्षय कुमार(उद्यान विज्ञानं)श्री राजकुमार (सस्य विज्ञान), डॉ रीनू कुमार (सस्य विज्ञान) आदि उपस्थित रहे

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